दिल की आपबीती - देवांश शर्मा

by March 29, 2020 4 Comments
काश उनको पता हो ये हाल मेरे दिल का

तारों बिना चाँद की भी शान नही है
रूठी हुई हैं जो प्रेमिका हमसे
आजतक चेहरे पर वो मुस्कान नही है

आकाश और धरती के जैसे है ये कहानी
सुलगते अंगारों पर चलती प्रेमी की जुबानी
जल रहे हैं पांव लेकिन चल रहा हूँ मैं
एक नई प्रेम गाथा को यूं लिख रहा हूँ मैं

जिस नफरत की चादर को ओढ़ बैठी हो तुम
प्रेम की बारिश से उसे भिंगो दूंगा मैं
इस कदर यूँ छा जाएंगे दिल मे तुम्हारे हम
चाहोगे सर्दियों में धूप की तरह हमे

गुलाब में लगे होते हैं कांटे जिस तरह
प्रेम में नफरत मिलती है उस तरह
हम दोनों की जुदाई तो किस्मत में है लिखी।
तन्हाइयों के मंजर की यही है आपबीती।

Creation by Dewansh Sharma
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Aman Prithviraj

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